लगता है थानेदार जी DSP से भी बड़े हो गए!SP के आदेश की पालना नहीं हुई? दो साल बाद DSP को फिर देना पड़ा आदेश, बानसूर थाने की कार्यशैली पर गंभीर सवाल

SP के आदेश की पालना नहीं हुई? दो साल बाद DSP को फिर देना पड़ा आदेश, बानसूर थाने की कार्यशैली पर गंभीर सवाल.

 

209-पुलिस अधिकारियों द्वारा मिथ्या सूचना एवं झूठे अभिलेख प्रस्तुत करने के बाबत F.I.R. दर्ज करवाने

Legal Ambit के राष्ट्रीय अध्यक्ष राव धनवीर सिंह ने पुलिस अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज कराने की मांग की

कोटपूतली-बहरोड़। पुलिस विभाग के रिकॉर्ड और न्यायालयीन अभिलेखों के बीच कथित विरोधाभास को लेकर गंभीर मामला सामने आया है। Legal Ambit के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं वरिष्ठ RTI कार्यकर्ता राव धनवीर सिंह नम्बदार ने पुलिस थाना कोटपूतली में परिवाद प्रस्तुत कर संबंधित पुलिस अधिकारियों एवं अन्य लोक सेवकों के विरुद्ध FIR दर्ज कर निष्पक्ष जांच की मांग की है।

2022 में SP अलवर ने दिए थे कार्रवाई के निर्देश

उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार 7 अक्टूबर 2022 को तत्कालीन पुलिस अधीक्षक, अलवर द्वारा पत्र क्रमांक अप/अल/म.अ./22/8116 के माध्यम से थाना बानसूर को संबंधित मामले में कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे।

परिवाद में आरोप है कि इन निर्देशों की थाना स्तर पर अपेक्षित पालना नहीं की गई। इसी पत्र के संदर्भ में पुलिस अधीक्षक अलवर द्वारा संबंधित शिकायतकर्ता के विरुद्ध IPC की धारा 182 एवं 211 के तहत कार्रवाई के निर्देश दिए जाने का उल्लेख परिवाद में है।

करीब दो साल बाद फिर आया DSP का आदेश

मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार 1 अगस्त 2024 को पुलिस उप अधीक्षक, बानसूर, जिला कोटपूतली-बहरोड़ द्वारा आदेश क्रमांक 310 जारी किया गया।

इस घटनाक्रम ने सवाल खड़ा कर दिया है कि यदि पुलिस अधीक्षक, अलवर द्वारा 7 अक्टूबर 2022 को ही थाना बानसूर को कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे, तो उनकी समय पर पालना क्यों नहीं हुई? और करीब दो वर्ष बाद पुलिस उप अधीक्षक स्तर से फिर आदेश जारी करने की आवश्यकता क्यों पड़ी?

“लगता है थानेदार जी DSP से भी बड़े हो गए!”

मामले को लेकर व्यंग्यात्मक सवाल उठ रहा है—

“अगर SP साहब के आदेश की पालना नहीं हुई और दो साल बाद DSP साहब को फिर आदेश करना पड़ा, तो क्या थानेदार जी पुलिस उप अधीक्षक से भी बड़े हो गए?”

बेशक यह सवाल व्यंग्यात्मक है, लेकिन इसके पीछे गंभीर प्रशासनिक प्रश्न है कि वरिष्ठ अधिकारी के आदेश की कथित रूप से पालना नहीं होने के लिए जिम्मेदार कौन है?

2022 की FIR, पुलिस की अंतिम रिपोर्ट और न्यायालय का आदेश

परिवाद के अनुसार थाना बानसूर में FIR संख्या 434/2022, धारा 376 एवं 506 IPC के तहत दर्ज हुई थी। पुलिस जांच के बाद अंतिम रिपोर्ट संख्या 668/2022 दिनांक 11 अक्टूबर 2022 न्यायालय में प्रस्तुत की गई। परिवाद में बताया गया है कि संबंधित न्यायालय ने 19 जुलाई 2023 को अंतिम रिपोर्ट स्वीकार कर ली थी।

राव धनवीर सिंह ने इसके बाद पुलिस अधिकारियों के समक्ष संबंधित शिकायतकर्ता के विरुद्ध IPC की धारा 182 एवं 211 के तहत कार्रवाई की मांग उठाई थी।

RTI के जवाब ने खड़े किए नए सवाल

राव धनवीर सिंह द्वारा RTI के माध्यम से मांगी गई सूचना के जवाब में पुलिस की ओर से कथित तौर पर बताया गया कि FIR संख्या 434/2022 के संबंध में IPC की धारा 182 एवं 211 के तहत इस्तगासा डिस्पैच नंबर 991-92 दिनांक 15 अप्रैल 2024 के माध्यम से न्यायालय में पेश किया जा चुका है।

लेकिन जब परिवादी ने न्यायालय के अभिलेख संरक्षक से संबंधित दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां मांगीं तो परिवाद में संलग्न न्यायालयीन पत्र के अनुसार 16 जून 2026 को बताया गया कि ऐसा कोई इस्तगासा न्यायालय के समक्ष पेश नहीं किया गया और न ही रिकॉर्ड में दर्ज है।

पुलिस रिकॉर्ड बनाम कोर्ट रिकॉर्ड—आखिर सच क्या है?

यही कथित अंतर अब पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू बन गया है।

यदि पुलिस के पत्राचार में किसी इस्तगासे को न्यायालय में पेश किए जाने की बात कही गई और दूसरी ओर न्यायालयीन रिकॉर्ड में उसका अस्तित्व नहीं मिलता, तो यह जांच का गंभीर विषय है कि रिकॉर्ड में यह अंतर कैसे उत्पन्न हुआ।

परिवाद में संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच कर कानूनी कार्रवाई की मांग की गई है।

झूठी FIR कराने वाले पर भी कार्रवाई होनी चाहिए—सुप्रीम कोर्ट की नजीर

इस मामले का एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू यह भी है कि यदि किसी व्यक्ति द्वारा जानबूझकर झूठी सूचना देकर किसी निर्दोष व्यक्ति को आपराधिक मामले में फंसाया गया हो, तो मामला केवल FIR के खारिज या अंतिम रिपोर्ट तक सीमित नहीं रहता।

सुप्रीम कोर्ट ने 5 अक्टूबर 2021 के एक फैसले में स्पष्ट किया कि FIR दर्ज करते समय पुलिस को यह तय नहीं करना होता कि सूचना सही है या झूठी; यह जांच का विषय है। लेकिन जांच के बाद सूचना झूठी पाई जाती है तो शिकायतकर्ता के विरुद्ध false FIR के लिए अभियोजन चलाने का विकल्प उपलब्ध है।

इसका सीधा अर्थ यह है कि FIR दर्ज होना शिकायतकर्ता को जांच और जवाबदेही से मुक्त नहीं करता।

Bhajan Lal के सिद्धांत भी महत्वपूर्ण

सुप्रीम कोर्ट ने State of Haryana v. Bhajan Lal के स्थापित सिद्धांतों में ऐसे मामलों में उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप की गुंजाइश स्वीकार की है, जहां आपराधिक कार्यवाही दुर्भावना से प्रेरित हो या कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग हो। सुप्रीम कोर्ट ने बाद के निर्णयों में भी कहा है कि दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य से शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना abuse of process of law हो सकता है।

हालांकि न्यायालय यह भी स्पष्ट करता है कि FIR के आरोपों की सत्यता का पूरा परीक्षण सामान्यतः जांच/ट्रायल का विषय है और हाईकोर्ट को ऐसे मामलों में सावधानी से हस्तक्षेप करना चाहिए।

इस मामले में बड़ा सवाल—झूठी FIR पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

परिवाद के अनुसार पुलिस ने FIR 434/2022 की जांच के बाद अंतिम रिपोर्ट न्यायालय में पेश की और उसे न्यायालय द्वारा स्वीकार किए जाने का उल्लेख है। साथ ही पुलिस अधीक्षक, अलवर द्वारा संबंधित शिकायतकर्ता के विरुद्ध IPC की धारा 182 एवं 211 में कार्रवाई के निर्देश दिए जाने की बात भी दस्तावेज में है।

ऐसे में सवाल उठता है—

जब पुलिस की जांच में मामला झूठा पाए जाने का उल्लेख है और पुलिस अधीक्षक द्वारा कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे, तो उन निर्देशों की पालना क्यों नहीं हुई?

यदि निष्पक्ष जांच में यह प्रमाणित होता है कि FIR जानबूझकर झूठी सूचना देकर किसी व्यक्ति को फंसाने के उद्देश्य से कराई गई थी, तो शिकायतकर्ता एवं झूठे साक्ष्य देने वालों की भूमिका की भी कानून के अनुसार जांच और कार्रवाई होनी चाहिए।

सिर्फ शिकायतकर्ता ही नहीं, पुलिस अधिकारियों की भूमिका भी जांच के घेरे में

मामला केवल कथित झूठी FIR तक सीमित नहीं है। वर्तमान परिवाद में पुलिस द्वारा न्यायालय में कथित इस्तगासा पेश किए जाने के दावे और न्यायालयीन रिकॉर्ड में उसके उपलब्ध नहीं होने का आरोप भी लगाया गया है।

इसलिए निष्पक्ष जांच में यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि—

– पुलिस अधीक्षक के 7 अक्टूबर 2022 के निर्देशों की पालना क्यों नहीं हुई?
– वर्ष 2024 में DSP को पुनः आदेश जारी करने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
– पुलिस द्वारा कथित इस्तगासा न्यायालय में पेश किए जाने की सूचना किस रिकॉर्ड के आधार पर दी गई?
– न्यायालयीन रिकॉर्ड में उक्त दस्तावेज उपलब्ध क्यों नहीं है?
– यदि किसी स्तर पर गलत सूचना या गलत रिकॉर्ड प्रस्तुत हुआ तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है?
– और यदि FIR जानबूझकर झूठी पाई जाती है तो उसके लिए जिम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई क्यों न हो?

कई अधिकारियों की भूमिका जांच के घेरे में

परिवाद में नेमसिंह, राज्य लोक सूचना अधिकारी एवं अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (मुख्यालय), कोटपूतली-बहरोड़, RTI शाखा प्रभारी, तत्कालीन बानसूर थाना प्रभारी अरुण सिंह, संबंधित पुलिसकर्मी तथा जांच में सामने आने वाले अन्य लोक सेवकों की भूमिका की जांच की मांग की गई है।

दस्तावेजों के साथ FIR की मांग

राव धनवीर सिंह ने परिवाद के साथ पुलिस अधीक्षक अलवर का पत्र, न्यायालय का आदेश, RTI आवेदन एवं जवाब, कथित डिस्पैच संख्या 991-92 तथा न्यायालय से प्राप्त प्रमाणित अभिलेख सहित विभिन्न दस्तावेज संलग्न किए हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल—कानून सबके लिए बराबर है या नहीं?

एक तरफ 2022 में SP अलवर के निर्देश, दूसरी तरफ 2024 में DSP बानसूर का आदेश, तीसरी तरफ RTI में पुलिस द्वारा कथित इस्तगासा न्यायालय में पेश किए जाने की सूचना और चौथी तरफ न्यायालयीन रिकॉर्ड में उसके उपलब्ध नहीं होने का दावा—इन घटनाक्रमों ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

Legal Ambit के राष्ट्रीय अध्यक्ष राव धनवीर सिंह ने पूरे मामले में निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए कहा है कि यदि जांच में कोई व्यक्ति दोषी पाया जाता है, चाहे वह शिकायतकर्ता हो, गवाह हो या लोक सेवक—कानून के अनुसार उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए।

अब देखना होगा कि पुलिस प्रशासन इस परिवाद पर क्या कार्रवाई करता है और SP के आदेश की कथित पालना नहीं होने तथा पुलिस एवं न्यायालयीन रिकॉर्ड में सामने आए कथित अंतर की निष्पक्ष जांच कब और किस स्तर पर होती है।

Justice Ambit की नजर पूरे मामले की आगामी कार्रवाई पर बनी रहेगी।

नोट: यह समाचार परिवाद एवं उपलब्ध दस्तावेजों तथा संबंधित न्यायिक सिद्धांतों पर आधारित है। परिवाद में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र जांच एवं संबंधित अधिकारियों/अन्य पक्षों का जवाब सामने आना अभी बाकी है। किसी व्यक्ति को दोषी मानना जांच और न्यायिक प्रक्रिया के परिणाम पर निर्भर करेगा।

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