सीधी टक्कर
‼घुटन से भागे लाडनूं के नेता जी और सियासत की नई मोर्चरी‼
✍महावीर पारीक
लाडनूं में नेता जी का अपनी ही पार्टी में दम घुटने लगा तो उन्होंने दूसरी पार्टी का फटा पुराना पल्लू थामने का मन बना लिया। इसे महज़ दलबदल की एक और मामूली घटना मान लेना सियासत की उस नब्ज़ को न समझना होगा, जिसमें बेचैनी, महत्वाकांक्षा और कुर्सी की ख़ुशबू एक साथ दौड़ती है। यह पहली बार नहीं हो रहा है। जब किसी पार्टी के भीतर नेता जी को अपना आसमान छोटा लगने लगता है तो सामने वाली पार्टी की बहुमंज़िला इमारत अचानक उन्हें लोकतंत्र का शानदार महल दिखाई देने लगती है।
दोस्तों!! परिन्दे जब खिड़की से खुला आसमान देखते हैं और दूर चील-कौवों को लंबी उड़ान भरते देखते हैं तो उन्हें पेड़ से उल्टे लटके चमगादड़ों का कुनबा दिखाई नहीं देता। सियासत में भी यही होता है। पार्टी के भीतर कस मसाता हुआ नेता जब दूसरी तरफ देखता है तो उसे वहाँ सिर्फ़ अवसर दिखाई देते हैं, अपनी संभावित कुर्सी दिखाई देती है, स्वागत में बिछी लाल कालीन दिखाई देती है; उसे यह दिखाई नहीं देता कि जिस घर में वह प्रवेश करने जा रहा है, वहाँ पहले से कितने लोग अपने-अपने हिस्से की हवा के लिए संघर्ष कर रहे हैं❓ कितने कांक्रोच और चूजे ड्राइंग रूम के बाहर खड़े हैं❓
लाडनूं के नेता जी! गेस फैक्ट्री की गेस से रोटिया सेकनी चाही और दूसरी पार्टी में पहुँचे तो स्वागत भी भव्य होगा । ऐसा स्वागत कि लगे जैसे मुर्दों के टीले में अचानक जान आ गई हो।
दूसरी पार्टी की मोर्चरी में फैली घुटन को जैसे किसी ने इत्र की शीशी खोलकर ख़ुशबू में बदल दिया हो। कैमरे आएगे , मुस्कानें आएगी , माला आएगी, स्वागत होगा और नेता जी को लगेगा कि शायद अब उनकी राजनीतिक ऑक्सीजन की कमी दूर हो गई है।
उन्होंने भगवा उतारना होगा रंग बदलेगा, दहलीज़ बदलेगी चेहरे वही रहे, महत्वाकांक्षाएँ वही रहीं और सबसे बड़ी बात—सियासत वही रही।
नेता जी को शायद लग रहा है कि पार्टी बदलते ही आबोहवा भी बदल जाएगी। मगर उन्हें कौन समझाए कि घुटन कपड़े बदलने से नहीं जाती। जिस घुटन से बचकर वे निकले हैं, वह अब उनके साथ नए घर में भी चली आई है। बल्कि हो सकता है कि यहाँ वह और दमघोंटू साबित हो।
जहाँ पहले से कालकोठरी की घुटन में फड़फड़ा रहे हों, वहाँ नए मेहमान को अचानक खुली हवा कैसे मिल जाएगी ?
सियासत का सबसे बड़ा भ्रम यही है कि बाहर का दरवाज़ा खुला दिखाई देता है तो भीतर की जगह भी ख़ाली समझ ली जाती है। नेता जी को लगता है कि नई पार्टी में उनका स्वागत नई दुल्हन की तरह होगा। मगर दुल्हन को यह भी तो देखना पड़ता है कि ससुराल में पहले से कौन-कौन अपनी जगह घर कर बैठा है। स्वागत के फूल कितने दिन चलते हैं, यह सियासत में किसी से छिपा नहीं है। फूल सूखते देर नहीं लगती और उसके बाद शुरू होती है असली गृहस्थी।
और अगर नेता जी की नज़र पालिका—पर है और इसी उम्मीद में पाला बदलकर आए हैं तो उन्हें यह भी समझ लेना चाहिए कि यह भाजप-कोंग्रेस पार्टीयां है, लेकिन पालिका की कुर्सी पर सिर्फ़ उनकी नज़र नहीं है। वहाँ पहले से कई ऐसे पुराने बाशिंदे बैठे हैं जिन्होंने वर्षों तक पार्टी के लिए पसीना बहाया है, जनता के बीच समय दिया है और अपनी बारी का इंतज़ार किया है।
उनसे यह उम्मीद करना कि वर्षों की निष्ठा को एक नए आगंतुक के स्वागत में समेटकर किनारे रख दिया जाएगा, शायद नेता जी की राजनीतिक गणित की सबसे बड़ी भूल होगी।
कुर्सी अगर इतनी ही आसानी से मिलती तो सियासत में निष्ठा, संघर्ष और संगठन जैसे शब्द कब के शब्दकोश से बाहर हो चुके होते।
और हाँ, नेता जी जो तेल वाले हैं वे ज़रा यह भी सोचें कि जिन कार्यकर्ताओं ने अपनी पार्टी के लिए वर्षों तक तेल निकलवाया हो, वे पार्टी छोड़कर आए हुए नेता के लिए अपने यहाँ तेल की नई पीपी इतनी आसानी से खोल देंगे क्या❓
जिन लोगों ने धूप में झंडे उठाए, चुनावों में रात-दिन एक किया, नेताओं के लिए नारे लगाए और हार-जीत दोनों में संगठन का बोझ ढोया—वे अचानक किसी नए आगंतुक को अपनी मेहनत की मलाई पर बैठा हुआ देखकर ताली बजाएँगे, यह मान लेना भी सियासत का बच्पन्न ही होगा
सियासत में बाहर से आने वाला नेता पहले मेहमान होता है, फिर उम्मीद बनता है और उसके बाद यदि कुर्सी की तरफ़ बढ़ने लगे तो वही मेहमान पुराने घरवालों की बेचैनी का कारण बन जाता है।
पुरानी बहू जब किसी नई दहलीज़ पर भागकर पहुँचती है तो नया पति भले ही ख़ुश हो जाए, उसके सगे-संबंधियों के चेहरे पर मुस्कान कितनी देर रहती है, यह अलग सवाल है। सियासत में भी स्वागत करने वाला नेतृत्व और वर्षों से खड़े कार्यकर्ताओं की भावनाएँ हमेशा एक नहीं होतीं।
इसलिए मेरे घुटन के मारे दोस्त! ज़रा ठहरकर साँस लीजिए।
आपने घर बदला है, सियासत नहीं। आपने रंग बदला है, व्यवस्था नहीं।
आपने दहलीज़ बदली है, दावेदार नहीं।
और सबसे बड़ी बात—आपने घुटन से भागने की कोशिश की है, मगर घुटन को पीछे छोड़कर नहीं आए हैं। वह आपके साथ आई है।
सियासत में शुद्ध आबो-हवा कहाँ है❓ हर पार्टी की अपनी मोर्चरी है, हर मोर्चरी की अपनी घुटन है और हर घुटन के बीच कुछ लोग ऑक्सीजन सिलेंडर लेकर कुर्सी की तरफ़ दौड़ रहे हैं।
नेता जी को बस इतना समझना है कि नई पार्टी की हवा तब तक ही ताज़ा लगती है, जब तक उसमें अपना हिस्सा माँगने वालों की गिनती न की जाए।
कल तक जो लोग उन्हें अपनी पार्टी में बोझ लगते थे, आज वही लोग नए घर में उनके रास्ते की दीवार बन सकते हैं।इसलिए पाला बदलने से पहले आसमान देख लेना चाहिए, मगर पेड़ पर उल्टे लटके चमगादड़ों को भी गिन लेना चाहिए।
क्योंकि सियासत में सबसे ख़तरनाक भूल यही है—घुटन से भागकर यह समझ लेना कि दूसरी तरफ़ हवा मुफ़्त मिलती है।

